अनारकली एक बोल्ड स्टेटमेंट है, सीधे आरा से!

एक हीरो है, वो विलेन भी है, उसके पास ताक़त है, उसे पावर का गलत काम में सही तरह से उपयोग करने भी आता है, हवस है, हवस की अग्नि को घी-तेल देने अफसर-सहयोगी भी हैं, वो निर्लज्ज है, घमंडी है, वो यूनिवर्सिटी का वीसी है। एक हीरोइन है, वो अनार है, वो देसी तंदूर … More अनारकली एक बोल्ड स्टेटमेंट है, सीधे आरा से!

रांची के किस्से…

झारखण्ड बंद है आज, गाड़ियां और ऑटो नहीं चल रहे; रांची में भी नहीं। कॉलेज की छुट्टी हुए अभी 2 दिन हुए हैं, ऋचा को 5 बजे शाम की ट्रेन पकड़नी है पर सुबह से वो परेशान है कि BIT मेसरा से रांची स्टेशन कैसे पहुंचा जाए। 500 रुपये में भी कोई औटोवाला जाने को … More रांची के किस्से…

शहर से दिल्लगी…

एक वो दिन था, और एक आज है। ट्रेन तो वही है, स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस पर इस बार दिल्ली से रांची नहीं जा रहा बल्कि रांची से गढ़वा तक का सफर है। वो दिन किसी दुःस्वप्न से कम थोड़े था। 90 की बैठने की क्षमता वाली बोगी में 200 लोग कैसे ठूंस दिए गए थे, … More शहर से दिल्लगी…

धार्मिक असहिष्णुता

असहिष्णुता वह सामाजिक-राजनितिक संकल्पना है जो धर्म जैसे सामाजिक मुद्दे के एक ख़ास काल-क्रम परिस्थिति में राजनीतिकरण का नतीजा है| दरअसल उत्पादन और अस्तित्व के बीच की कड़ी है असहिष्णुता| यह एक जीवंत उदहारण है जब एक ख़ास शासन में सांस्कृतिक नायकत्व के कारण धर्म अपने दैनिक उपस्थिति से निकल कर मुख्य धारा से भटक … More धार्मिक असहिष्णुता

BIT: सोच से आगे! कुछ खोया क्या एक साल में…

शहर की तंग गलियों से दूर, भीड़-भाड़ से बेखफ़ा, सामाजिक उलझनों से बेख़ौफ़, प्रकृति की गोद में अलमस्त आसन्न है बिरला प्रोद्योगिकी संस्थान, मेसरा| बारहवीं के कठिन दिनों से उबरकर जब 600-700 होनहार अपने नए कॉलेज में कदम रखतें हैं, तो उनका मन नाना प्रकार की बातों में उलझा रहता है| लगता है सुकून के … More BIT: सोच से आगे! कुछ खोया क्या एक साल में…

सब पढ़े-सब बढ़ें!

लीजिये हम आ गए- मैं और ये परीक्षाओं वाला मौसम भी! वसंत तो सबके लिए सुहावना ही होता है पर ये Exam का सीजन अपनी दिशा और दशा पल-पल बदलते रहता है. खैर वसंत और इस प्रतिबद्ध मौसम के समागम के साथ ही हमारे प्रथम वर्ष की भी समाप्ति हो रही है! कॉलेज जीवन का … More सब पढ़े-सब बढ़ें!

हॉस्टल की यादें..

यादें कितनी अजीब होती हैं, मनस पटल पर जमें इन यादों के धूल की परत को जब हम कुरेदेंगे, तो किस्से बनेंगे, जो अक्सर ठहाकों और गुफ्तगू में बदल जायेंगे. हॉस्टल में हमारा जीवन भी कितना अजीब होता है, किसी के लिए हॉस्टल घर होता है, किसी के लिए घर-समान तो किसी के लिए चिड़ियाघर. … More हॉस्टल की यादें..

जब…

जब… जब हॉस्टल के बरामदे पर मंद हो जाती है चहल-कदमी; जब PMC पर मोहब्बत से इतर जोड़ों में पढाई को लेकर चर्चा होती हैं; जब कक्षा में रिक्त पड़ी रहती है अग्रिम पंक्तियाँ, कॉलेज जाने की इतनी नापसन्दी होती है; जब सन्नाटों में गूंजता है Common Room और धुल चाटते हैं टेबल-टेनिस के टेबल; … More जब…

काउंटडाउन, Exams और डांडिया नाईट

51 दिन हो गए कॉलेज आये हमे 51 दिन और 51 रातें…. और हर गुज़रते दिन में संजोते ढेरों यादें! BIT के जीवन को समझने के लिये शायद 50 दिन काफी नहीं, तब जबकि कॉलेज में अग्रज-अनुज सहिष्णुता पर DSW के ग्रहण की छाया हो.., तब जब सुबह आठ बजे से शाम पांच बजे तक … More काउंटडाउन, Exams और डांडिया नाईट