तुम तक… रांझणा…

‘दिल का लोकेसन क्या होता है? न लेफ़्ट न राइट, दिल तो सेन्टर मे होता है क्योंकि मुझे दर्द वहीं पर हो रहा था!’ महज दसवीं में पढने वाले कच्चे उम्र के कुंदन को जब दर्द-ए-आशिकी का छोंक लगता है तो लगता है दुनियादारी की बांतें मानो उसे घोंट कर पिला दी गई हो। काशी बनारस में कुन्दन कुछ अलग अंदाज में प्यार करना चाहता है। रांझणा हमे इसी कुंदन के गालों पर पड रहे थप्प्डों और सीने में दौडती सांसों की गिनती सिखाती है, निर्देशक आनंद राय ह्में जोया परोसते हैं जो पढी- लिखी कुलीन परिवार से होने के बावजूद भी अपने जाहिल भावनाओ और ऊसूलों के बीच उलझ कर रह जाती है। हिमान्शु शर्मा की कहानी में बिंदिया है जो अपने एकतरफा प्यार को हासिल करने के लिये सभी आधुनिक और रूढीवादी हथकंडे अपनाती है। साथ में है कुंदन पर जान तक लुटाने वाला उसका दोस्त मुरारी।
और सब के बीच दौड्ती है बनारस की गलियां और काशी के घाट जहां रावन दहन के लिये चन्दा इकट्टा करने बच्चे शिव-विष्णु के वेष धर कर आते हैं – ‘भाव है कि नहीं राम जी का’। और सर्वत्र गूंजते हैं ‘हर हर महादेव’ के हूंकार।

प्रयोगों के इस दौर मे छोटे शहरों को नकारती फ़िल्मों से हटकर यह फ़िल्म बंबई या विदेशों की तरफ़ ज्यादा आकर्षित नहीं नजर आती। इस फ़िल्म में मंदिरों के शहर बनारस की होली है जिसमें सब सराबोर होना चाहते हैं, बनारसी इश्क के तरीके हैं और बनारस है- वैसा नहीं जो हम पढते या जानते हैं। वैसा बनारस जैसा ये है! बनारस का गमछा पूरे फ़िल्म भर लहराते रह्ता है।

छोटे लोग हमेशा बडे चीजों का सपना देखते हैं और बडे लोग और भी बडे का! इन्हीं सपनों के बीच पिसता है प्यार! प्यार में equality, secularism और democracy आदि क्यों नहीं होती! क्या प्यार को जाति, धर्म, वर्ग की परिभाषा और बन्धन की जानकारी होना आवश्यक है? कहीं न कहीं पूरे फ़िल्म के दौरान यह प्रश्नवाचक चिह्न लटकते रहता है!
सामाजिक और नैतिक मुद्दों पर कटाक्ष, आक्षेप और टिप्पणियों के बीच लिखी जाती है एक epic- रामायण और इस रामायण में ब्लेड की धार तीन-तीन बार कलाई के नसों को पृथक करती है। कुंदन के बचपन के लडकपन वाला ‘बाल इश्क कांड’ है तो जवानी का ‘मोहब्बत कांड’ भी है! जहां हर लड्का शाहरुख-सलमान होना चाहता है और चाहता किसे है- कैटरीना कैफ को! इतनी कैटरिनाएं कहां से बनाए भगवान!

दूसरी ओर जोया को ‘हैदर’ नहीं चाहिये, जो ना तो जशप्रीत में है और न कुन्दन में, उसे तो चाहिये उसके जैसा कोई, ना कि कोई जाहिल अनपढ! वो खुद को इतना पढाये जाने पर हर समय कोसती रहती है। कहानी हमें बनारस की संकरी गलियों से उठाकर दिल्ली कि चौडी सर्द सडकों पर पटक देती है जहां कुंदन लंका दहन करने आया है। जे एन यू के कैंपस में चोरी और गरीबी पर रात भर डिबेट चलता है। जे एन यू के भावी बुद्धिजीवियों के बीच रात भर चले बक्बक से बेहतर तो वही जाहिल था जो समोसे खाकर और चाय पीकर रात भर ठाट से सोता है! वही जाहिल जो अपने प्रतिद्वंदी द्वारा gas cyinder रिक्शा पर रखे जाने पर ईष्यावश उसे उतारकर खुद रिक्शा पर चढाता है!

जे एन यू में equality और असमानता और उनके प्रति सोच और action के बीच की परस्पर खाई साफ नजर आती है। वामपंथी मानसिकता, कट्ट्रर विचारधारा, उसूलों के पेंच और law of principles और principles of law के बीच उलझता है युवा सोच।
इस रामायण का राम अपना बाल कांड वपस नहीं देखना या जीना चाहता क्योंकि वहीं से शुरु होती है उसकी अधूरी एकतरफा-सी लव-स्टोरी, जो उत्तर कांड, मोहब्बत कांड होते हुए लंका दहन तक को जाती है। आग तो दिलों में सुलगती ही रहती है और आखिर में हार सबकी होती है। ‘जोया’ के पास खोने को कुछ बचा नहीं रहता, बनारस में पंडितजी रो नहीं पाते, मुरारी अपने ‘शनिच्चर’ को हारता है परंतु असली हार तो बिंदिया की होती है! पूरी मूवी के दौरान कुंदन के नाम के जो कंगन उसने पहने थे, वो उसके खून बकने के साथ ही टूट जाते हैं। दिल में सुलगती अग्नि ने आशा के अलख को अब तक प्रज्ज्वलित कर रखा था!

रहमान के कर्णप्रिय और पारंपरिक संगीत ने प्यार के इस क्षुधा को कुछ हद तक शांत अवश्य किया। आप बनारस से चलते हैं, दिल्ली, पंजाब घूमकर वापस आपका जी बनारस आने को करता है। कुंदन के love talent ने उसे क्या दिलाया ये तो आप फिलिम देखने के बाद ही जानियेगा परंतु बिंदिया के रुप में स्वरा भास्कर पूरे फिल्म में राज करती हैं। कुंदन तो हमेशा उसे कडे उत्तर ही देता रहा- ‘कुंदन के पायजामे का नाडा इतना भी कमजोर नहीं जो तेरे ______ __ दो हुक खुलने से ढीला हो जाए।’

आनंद राय कभी-भी दर्शकों को लुभाने वाले खुशनुमा scenes नहीं परोसते, उनके परोसने में क्रूर ईमानदारी स्पष्ट झलकती है। कहानी जटिल अवश्य है पर ‘रांझणा’ पारदर्शी है!! अफसोस जोया के गाल पर पप्पी अधूरी ही रह जाती है!!

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