जब…

जब…
जब हॉस्टल के बरामदे पर मंद हो जाती है चहल-कदमी;
जब PMC पर मोहब्बत से इतर जोड़ों में पढाई को लेकर चर्चा होती हैं;
जब कक्षा में रिक्त पड़ी रहती है अग्रिम पंक्तियाँ, कॉलेज जाने की इतनी नापसन्दी होती है;
जब सन्नाटों में गूंजता है Common Room और धुल चाटते हैं टेबल-टेनिस के टेबल;
जब देर रात तक किताबों पे टिकी रहती है निगाहें;
जब मेस में खाने के टेबल पर एकाध किताबों की झलकियाँ मिल जाती हैं;
जब अचानक कमरों में मोटी-मोटी किताबों का जमावड़ा लग जाता है;
जब न बिखरे कपड़ों की परवाह हो, और न WhatsApp टटोलने की फुर्सत;
जब सबके कानों में इयरफोन में गूंजते हो अंग्रेजी गाने;
जब दिन-प्रतिदिन कुतरन से घटने लगती हैं नाखूनों की लम्बाई;
जब अनायास नोचने से बाल अक्सर उलझ-बिखर जाएँ;
जब चेहरे पर झलके आत्मविश्वास, दृढ-निश्चय और प्रतिस्पर्धा की लकीरें, साथ में हो उम्मीद, चिंता, दबाव और झुंझलाहट के छींटे;
जब एक के बाद एक खाली होते जाते हैं बिस्कुट के पैकेट;
जब घड़ी की टिक-टिक कर्णपट को झंकृत कर आगाह करे की समय रेट की तरह मुट्ठी से फिसला जा रहा है;
जब नींद में झूमती शराबी आँखों को जबरदस्ती जगाया जाता हो;
जब किताबें ही अपना पहला और आखरी दोस्त लगने लगता हो…
तब….

लगता है परीक्षाएं आने वाली हैं!!

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