BIT: सोच से आगे! कुछ खोया क्या एक साल में…

शहर की तंग गलियों से दूर, भीड़-भाड़ से बेखफ़ा, सामाजिक उलझनों से बेख़ौफ़, प्रकृति की गोद में अलमस्त आसन्न है बिरला प्रोद्योगिकी संस्थान, मेसरा| बारहवीं के कठिन दिनों से उबरकर जब 600-700 होनहार अपने नए कॉलेज में कदम रखतें हैं, तो उनका मन नाना प्रकार की बातों में उलझा रहता है| लगता है सुकून के क्षण आने वाले हैं, अच्छे दिन आने वाले हैं…|

780 एकड़ का कैम्पस, देखने और सुनने में तो बहुत बड़ा लगता है, पर वृक्षों के घनत्व को देखते हुए यह छोटा लगने लगता है| चारों ओर फैली निर्मल और सुरम्य हरियाली एक सुखद अनुभव प्रदान करती है- ऐसी अनुभूति शहरों में कहां? कहने को कुछ नहीं है कैंपस में, पर जैसे-जैसे आप इसके नजदीक आते जायेंगे, मेसरा को समझते जायेंगे, तब आप पायेंगे की इस विद्या के अनंत सागर में गोते लगाने पर ही अनमोल सीप-मोती मिलेंगे| तकनीकी शिक्षा के बाजारीकरण के इस दौर में अपनी गरिमा और मूल्यों को बरक़रार रखना किसी भी संस्थान के लिए एक कठिन चुनौती से कम नहीं है| अच्छा है, बीआईटी ने इस चुनौती को सहर्ष स्वीकार किया है और दिन-दूनी रात-चौगुनी, तरक्की के नए कीर्तिमान स्थापित किये हैं| बारहवीं पास छात्रों में कॉलेज की लोकप्रियता इसका जीवंत उदहारण है! किसी भी संस्थान या तंत्र को मापने का आधार होता है, उसका प्रशासन| बीआईटी प्रशासन भरसक अच्छे अंक हासिल कर लेता है पर अफ़सोस अभी भी कई क्षेत्रों में विकास अपेक्षित है| इस डिजिटल दौर में, कछुए की चाल से हो रहे यहाँ के विभागों का कंप्यूटरीकरण, शायद छात्रों और शिक्षकों के लिए रोष का विषय बन सकता है| हर्ष की बात है कि कैंपस की आधारभूत संरचना के विकास पर प्रशासन की पूरी नज़र है और अगर यह दौर चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब बीआईटी आधुनिकतम कैम्पसों में से एक होगा..!

नामांकन के पेंचों को झेलकर जब छात्र अपने छात्रावास के कमरों में आराम फरमाते हैं तो उनका दिमाग आशाओं और उम्मीदों के किरणों से प्रकाशमान हो जाता है| उस पहली रात आँखों में नींद नहीं होती, बस सपने होते हैं- आने वाले चार वर्षों के सपने, चार बहुमूल्य वर्ष!!!! घर से मीलों दूर, भावनाओं के इस उधेड़बुन में रात कैसे कट जाती है, पता नहीं चलता! कक्षा में पहला दिन एक अलग किस्म का अनुभव होता है, अचानक सब बदल-सा जाता है| कहां गए सारे नियम-क़ानून, जो विद्यालयों में होते थे, कहां गया वो यूनिफार्म, कहां गया वो प्रथम पंक्ति में बैठने का जूनून, कहां गया वो कुछ नया करने, कुछ नया सीखने का जज़्बा, कहां गए वो दिन जब बचपना अपने चरम पर होता था?? लगता है परिवर्तन की आंधी-सी आ गयी हो जिसने सबको उड़ाकर कहीं दूर फेंक दिया हो| खैर, नए चेहरों से मुलाकात ज्यों ही बढ़ते जाती है, सारे प्रश्नों के उत्तर सहसा मिलने लगते हैं| ज़िन्दगी अलग-सी लगने लगती है – कॉलेज वाली जिंदगी, जैसा अक्सर फिल्मों में देखा करता था!!

जैसे-जैसे दिन बीतते जाते हैं, पता चलता है की तकनीकी शिक्षा सिर्फ किताबों और कक्षाओं तक ही सिमित नहीं, यहाँ तो बोनस भी है| छात्र संघों को कला और विद्या के आधार पर विभिन्न समाजों में विभाजित कर दिया जाता है| कोई साहित्य में रूचि रखता है, कोई संगीत या नृत्य में, कोई पत्रकारिता में, कोई नुक्कड़-नौटंकियों में तो कोई तकनीक व कंप्यूटर में, सबके लिए कुछ-न-कुछ होता है यहाँ! कैंपस को गुलज़ार रखने के लिए आये दिन अनेक आयोजन किये जाते हैं, जिससे न सिर्फ छात्रों का मनोरंजन होता है वरन उनके सर्वांगीण विकास में भी इनका अहम योगदान होता है| विभिन्न क्लबों द्वारा आयोजित क्रियाकलापों में भागीदारी, छात्रों को संलग्न रखते हैं| तकनीकी फेस्ट- पैनथिऑन और सांस्कृतिक महोत्सव- बीटोत्सव, पूर्वी भारत के सर्वोत्तम आयोजनों में से एक है, जहाँ देश-विदेश के कलाकार आकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं| साथ ही देश-विदेश के अनेकानेक महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों से आये युवा प्रतिभागियों से भी रूबरू होने का अवसर प्राप्त होता है!

इन सबके बीच, कई दफा तनाव के पल भी आते हैं! परीक्षा की दस्तक होते ही चारों ओर अजीब-सी हलचल दौड़ने लगती है| लगता है मानो रिंगमास्टर हाथ-धोकर पीछे पड़ गया हो| जैसे-जैसे परीक्षाओं के दिन पास आते हैं पढने की ललक क्षीण होती महसूस होती है! पूरा सिलेबस ख़त्म करने के सिवाय जोर इस बात पर होती है की किसी तरह परीक्षा में उत्तीर्णांक तो आ जायें! सोचते-समझते आशाओं और निराशाओं के बीच किसी तरह कॉलेज जीवन के सबसे कठिन समय पार होते हैं! परीक्षा की समाप्ति पर हर दिन होली और हर रात दिवाली मनती है! कोई दिनरात सोया रहता है, तो कोई सारी कसर काउंटर स्ट्राइक और डोटा खेलकर निकलता है! कहीं दिनरात मस्ती का दौर चलता है तो कोई परीक्षा में की गयी गलतियों और उसके परिणामों के बारे में सोचकर अपना समय बर्बाद करता है| पर चारों ओर खुशियाँ ही खुशियाँ होती हैं- घर वापसी की खुशियाँ, अपने परिवारजनों से मिलने की खुशियाँ, छुट्टियों के आगमन की खुशियाँ! मन में कॉलेज की खट्टी-मीठी यादों को संजोये, हम चल पड़ते हैं वापस अपने घरों की ओर, एक नयी आशा के साथ कि अगले सेमेस्टर में फिर मुलाकात होगी, एक नयी उम्मीद के साथ कि आने वाला कल और भी शानदार होगा, एक भरोसे के साथ कि बीआईटी आने वाले वर्षों में भी इसी तरह अपनी सेवा से सिंचित-पल्लवित-पुष्पित करता रहेगा! दुःख बस इस बात का होता है कि घर पर DC की सुविधा नहीं होती| प्रायः लोगों को घरों पे बीआईटी की याद कम, और DC की याद ज्यादा आती है!

परीक्षाओं से ज्यादा भय छात्रों को अपने परिणाम से लगता है! परिणाम के अनुमान के अनुकूल आने की प्रायिकता लगभग शुन्य होती है| कहीं अंकों की वर्षा होती है तो कहीं अंकों का अकाल पड़ता है! दोनों ही स्थितियों में जमकर जश्न मनाई जाती है! कोई पिटता है तो बाकी पीटते हैं| हो सकता है कि घर पे किसी का जन्मदिन बड़े धूम-धाम से मनता हो पर कॉलेज में जन्मदिन पर जो धमाका होता है, वो शायद ही जीवन के किसी पड़ाव पर देखने को मिले!

देखते ही देखते एक साल कैसे बीत जाता है, पता नहीं चलता! लगता है समय के कांटे को तेज़ कर दिया गया हो! खैर दुनिया में एक समय ही है जिसका वितरण सबके लिए समान है, किसी के लिए ये वर्ष बर्बाद हो जाता है और कोई इसका भरपूर सदुपयोग करता है! पर ये एक साल का समय बहुत कुछ सिखा जाता है! आप वो नहीं रहते जो आप एक साल पहले थे| खैर, हार कर जीतने वाले को ही बाज़ीगर कहते हैं! ‘

मिला-जुलाकर, बीआईटी मेसरा अपने आप में एक संपूर्ण पैकेज है, एक पिटारा है, जिसे जिसने खोला वही जानता है कि अन्दर कितने रत्न समाहित हैं! बीआईटी का लड्डू- जो खाए सो भी पछताए, और जो न खाए वो भी पछताए!

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