धार्मिक असहिष्णुता

असहिष्णुता वह सामाजिक-राजनितिक संकल्पना है जो धर्म जैसे सामाजिक मुद्दे के एक ख़ास काल-क्रम परिस्थिति में राजनीतिकरण का नतीजा है| दरअसल उत्पादन और अस्तित्व के बीच की कड़ी है असहिष्णुता| यह एक जीवंत उदहारण है जब एक ख़ास शासन में सांस्कृतिक नायकत्व के कारण धर्म अपने दैनिक उपस्थिति से निकल कर मुख्य धारा से भटक जाती है| धार्मिक असहिष्णुता समाज की वह अस्थायी स्थिति है जो न सिर्फ समुदाय और धर्म को ध्रुवीकरण की ओर ले जाती है बल्कि अक्सर राष्ट्र के ध्रुवीकरण का भी कारण बनती है| इस काल्पनिक स्थति में लोगों के मन में दुसरे धर्म या समुदाय के लोग, विचारधारा व मान्यताओं के प्रति ऐसे विष घोले जाते हैं जो अक्सर उपद्रव और दंगों का कारण बनते हैं| इतिहास गवाह है कि भारत में धर्म, जाति, रंग, विद्वेष, राजनितिक लामबंदी को लेकर नोंक-झोंक की कोई कमी नहीं रही है| चाहे जितना भी दावा किया जाये पर भारत में कभी वो ‘स्वर्णिम काल’ आया ही नहीं; हाँ, सहनशीलता और महानगरीय सौहार्द के कई पल जरुर आये| असहिष्णुता दिलचस्प अपवाद हैं, न कि कोई नियम!

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, साथ ही भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है| संविधान के प्रस्तावना में उल्लेख मिलता है कि भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनने की कामना करता है| भारत के संविधान के ह्रदय में धर्मनिरपेक्षता का वास है! हर राष्ट्र के संविधान का यही उद्देश्य होता है एक आदर्श पथ को चुनना; उस लक्ष्य की प्राप्ति तो जनता में निहित होती है| वैसे भी कोई भी राष्ट्र संपूर्ण नहीं हो सकता! भारतीय संविधान के 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 के तहत भारत को पंथनिरपेक्ष राष्ट्र का दर्जा प्राप्त है, तथा अनुच्छेद 15 और 25 में विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता का भी जिक्र मिलता है| पर लोग इस स्वतंत्रता का दुरूपयोग व्यक्तिगत व धार्मिक बढ़ोतरी के लिए करने लगते हैं तो समाज में वैमनस्य की भावना का संचार होता है| कहने को तो भारत हमारी मातृभूमि है, पर वास्तव में हम बटें हुए हैं, कहीं हिंदू मुस्लिम सिख इसाई में तो कहीं उप्परक्लास मिडिलक्लास लोअरक्लास में तो कहीं ईमानदार और बेईमानों में| 1984 के सिख विरोधी दंगे हो या 2002 के मुस्लिम विरोधी दंगे या 2008 के इसाई विरोधी दंगे, भारत में धर्म को लेकर विवादों का इतिहास काफी पुराना है, जिससे सांप्रदायिक सौहार्द को काफी क्षति पहुँचती है| हर दंगे अपने पीछे घृणा और आपसी वैमनस्य के बीज छींट कर फिर से कई नए दंगों की पृष्ठभूमि तैयार करते है।

धर्म की परिभाषा ही ऐसी है! मूलतः आदिकाल से धर्म का स्पष्ट स्वरुप नहीं था तथा प्राकृतिक शक्तियों से भयभीत होना और मान्यताएं-अन्धविश्वास ही धर्म का वास्तविक स्वरुप बन गया| धर्म प्रवर्तन के साथ ही भारत में गठित हिंदू, जैन, बुद्ध, सिख आदि धार्मिक समुदायों के अतिरिक्त इसाई और इस्लाम जैसे धर्मों के मतों का प्रचार-प्रसार हुआ| परिणामतः भारत में धार्मिक विविधता का होना स्वाभाविक था| भारत ने सदैव ही सभी प्रकार के मतों, सिद्धांतों और मान्यताओं को सामान महत्व दिया है| भारत के इसी चारित्रिक लचीलेपन के कारण ही आज यह सहिष्णु राष्ट्र है| पर जब कभी भी मनुष्य के भीतर का पशु जाग जाता है, तब सामाजिक ताने-बाने छिन्न-भिन्न हो जाते हैं| न्याय, प्रेम, अहिंसा, सत्य के बुनियाद पर खड़े सभी धर्मों का मूल तथ्य धार्मिक सहिष्णुता ही रहा है| धर्म को माने वाले अगर धर्म की गलत व्याख्या कर यदि उसका दुरूपयोग करें तो उसमे धर्म की क्या गलती?

असहिष्णुता वर्तमान समय के सोशल मीडिया की सबसे आश्चर्यजनक पैदाइशों में से एक है जहाँ मौखिक आतंक की आड़ में मुद्दे न जाने कहां गुम हो जाते हैं| धार्मिक असहिष्णुता और इसपर होने वाले चर्चे उसी सोशल नेटवर्क के सामाजिक प्रवचन का विस्तृत अंग है| राजनितिक संगठनों और मीडिया ने हर घटना में आग में घी डालने जैसी हरकतें कीं| जब भी दो समुदायों के बीच विवाद होते हैं, सत्ताधारी और विपक्ष इससे अपने-अपने फायदे की बात सोचते हैं जिसे भारतीय राजनीति का विकृत स्वरुप कहा जा सकता है| अच्छा होगा कि कारण और उत्पत्ति पर ध्यान कम देकर निष्कर्ष और सुधार पर विचार किया जाये| भारत की शक्ति और पहचान सशक्त लोकतंत्र और सभ्यता के बहुलवाद की बहुमूल्य विरासत से है| पर वास्तविक दावित्व तो आम लोगों को निभाना है| समाज के हर वर्ग में शिक्षा का अलख जगाने की जरुरत है क्योंकि अफवाहों की आंधी में अशिक्षित समाज यूँ ही बहकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने को तत्पर हो जाते हैं और धार्मिक सहिष्णुता रूपी हथियार हालात बिगड़ने पर भोथरे हो जाते हैं| लोगों को अखबार में खबर पढ़कर अपना पलड़ा झाड़ने के बजाये आपस में विचार कर विवादों को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए| लेकिन यह सब कहना जितना आसान लगता है, करना शायद उतना सरल नहीं है क्योंकि धर्म जितना अच्छा है धार्मिकता उतनी ही बुरी!

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