शहर से दिल्लगी…

एक वो दिन था, और एक आज है। ट्रेन तो वही है, स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस पर इस बार दिल्ली से रांची नहीं जा रहा बल्कि रांची से गढ़वा तक का सफर है। वो दिन किसी दुःस्वप्न से कम थोड़े था। 90 की बैठने की क्षमता वाली बोगी में 200 लोग कैसे ठूंस दिए गए थे, मैं ही जानता हूँ। सामान रखने वाले स्पेस में बैठने की जगह क्या मिली थी, उसे मैं अपना साम्राज्य समझ बैठा था; जीत जो लिया था जगह अपना। गर्मी, उमस और भीड़! सामान्य आदमी को चक्कर और उलटी आने के लिये इतने हथियार काफी होते हैं। शुक्र है मैं बहादुर निकला और कायरता के भय से जीवन का बहुमूल्य अध्याय लिख डाला। उस दिन मैं मजबूर था, परिस्थिति के आगे घुटने टेक चुका था। आज मौसम भी खुशनुमा है और परिस्थितियां भी अनुकूल। आज भय नहीं सीने में, अफ़सोस भी नहीं। आज सामान्य श्रेणी में भी सोने की उत्तम व्यवस्था है पर आज आँखों में नींद कहाँ! आज तो आँखों के सामने यादों के झरोखे हैं, यादें जिनको छोड़ 6 साल पूर्व मैं रांची आ गया था। बचपन के वो 12 साल जहाँ बिताये, वहां वापस जाना हमेशा मन को आह्लादित कर देता है।
छोटे शहरों की अपनी विडम्बना है, वहां न महानगरों वाली चकाचौंध मिलती है और न ही गांव वाला सुकून। चारों और न तो हरियाली का विस्तार है, न ही कंक्रीट का जंगल है। रोड कच्चे भी हैं, पक्के भी, हाईवे भी है और फ्लाईओवर भी, ओला और उबर नहीं चलते यहाँ की सड़कों पर, न ही ट्रैफिक का झंझट होता है। सबकुछ सामान्य-सा होता है। ऐसे शहर फिल्मों में नहीं दिखते, बस होते हैं। डोमिनोज़, KFC, McDonalds का आतंक अभी मीलों दूर है, हाँ पान-गुटखा के दुकान हर चौक-चौराहों पर मिलेंगे; वे होटल मैनेजमेंट तो नहीं पढ़े पर गुमटी पर भीड़ बढ़ाना कोई उनकी मीठी बातों से सीखे। यहाँ सिनेमा हॉल ऑनलाइन नहीं बुक होते, लाइन लगना पड़ता है, गालियां सुननी पड़ती है। सिनेमा हॉल में बिना AC के लकड़ी के मेज पर बैठना होता है, फिर भी फिल्में मारधाड़ एक्शन से भरपूर शानदार 4थे सप्ताह तक चलते हैं। क्रिस्टोफर नोलन को कोई नहीं जानता, न लियोनार्डो और जॉनी डेप को, यहाँ तो आज भी सन्नी देओल, निरहुआ और सलमान सबके दिलों पर राज करते हैं। मॉल का प्रचलन अब शुरू हो गया है पर लोग खुदरा बाज़ार जाकर बारगेनिंग करना ज्यादा पसंद करते हैं।
अर्थव्यवस्था के बाज़ारीकरण का सबसे गन्दा मार ऐसे ही शहरों ने झेला है। विकास का खाका तो लगता है 8-10 साल पहले ही खिंच गया था, राम जाने धरातल पर कब आएँगी वो! नेता तो कितने बदल दिए हैं यहाँ के जनादेश ने, पर भ्रष्टाचार के सबसे गन्दी बदबू हमारे शहर से ही आती है। शर्म तो आती है, पर शहर को उम्मीद है कि आज नहीं तो कल, एक नया सवेरा आएगा।
यह वही शहर है जिसने मेरे भीतर के मेधा को पहचान लिया था, प्रतियोगिता कितनी भी कड़ी होती, मेरे ज्ञान का परिमार्जन होता गया। किंडरगार्टन में टॉप करने पर जब प्राइज में टिफ़िन बॉक्स और वाटर बोतल मिला तो घर-पड़ोस में ख़ुशी का ठिकाना न था। फिर क्या था, घरवालों ने शहर के सबसे अच्छे इंग्लिश मीडियम स्कूल में नामांकन करा दिया था। फीस भरने की औकात तो थी नहीं पर पिताजी ने किसी तरह हमारे लिए व्यवस्था की। यहीं से प्रतिस्पर्धा की जो लत लगी थी, वो IIT की प्रवेश परीक्षा पर आकर रुकी। मायानगरी तो नहीं था, पर सपने देखना मैंने यहीं से सीखा। गलियों में खेलता-कूदता, गिरता-पड़ता, रोता-हँसता धीरे-धीरे मैं बड़ा होने लगा था, शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से। घर पे टीवी के नाम पर ब्लैक एंड वाइट डब्बा पड़ा था जिसपे दूरदर्शन के कार्यक्रमों ने इतना पका दिया था कि तंग आकर डी2एच लगवाया गया।। तब शायद पड़ोस के घरों पे Mr Bean और Tom & Jerry मिलते थे। कॉलोनी में गजब का अपनापन था, नगरों में ऐसे भाईचारे के किस्से शायद न मिले! शर्मा अंकल आम दे जाते, बुलबुल के घर से अमरुद मिल जाते थे, बाबूसाहब जी के यहाँ से साग-सब्ज़ी और मेहता अंकल के घर से ढेर सारा प्यार। शाम हमारे कभी गिल्ली-डंडे में बीत जाते, कभी क्रिकेट के लड़ाई-झगड़ों में, तो कभी Hercules और अलादीन देखने में। माँ न जाने कितना डांटती थी पढ़ने के लिए पर कॉलोनी के लड़कों में अटूट एकता थी। उस ज़माने में गौतम और अभय को आउट करने में जो ख़ुशी मिलती थी, शायद आज घर वापसी पर न होती हो। मैं सबसे छोटा था, छोटू था, बैटिंग तो मिलती थी नहीं, मिली भी तो 4 से 5 गेंद मेरे लिए काफी थे। फिर भी हमारी कॉलोनी की टीम में कितने झंडे गाड़े और न जाने कितने टीमों को चारों खाने चित्त किया।
स्कूल बस की सवारी भी अपने आप में आनंददायक होती थी। बस से ही पूरे शहर का भ्रमण हो जाता था, सीट के लिए मारा-मारी बिलकुल आम बात थी। तब स्कूल भी पढ़ने के उद्देश्य से जाते थे। स्कूल में नया लाइब्रेरी खुला था, मैंने अपना पहला बुक निर्गत किया था- विश्व का एटलस। फिर तो किताबें स्कूल से पुरस्कारों में मिलने लगे थे। घर पर सबसे छोटा था मैं, दीदी के लिए किताबें खरीदी जाती थी जो भैया के निर्मम हाथों से गुजरता मेरे पास आता था। मैंने कभी नयी किताबों की ज़िद भी नहीं की, न मुझे मिली। 12वीं तक यह किताबों का उत्तराधिकार चलता रहा! घर पे माँ ही टीचर थी, 5 साल के उम्र में 30 तक का पहाड़ा ज़बान पर था मेरे। आज 17 का न बोल पाऊँ! खाना पकाते वक़्त साथ बिठाती थी हमको और A for Apple बताती। तब दिन की शुरुआत 5 बजे होती थी और अंत 10 बजे। रविवार तो सही मायने में मस्ती का दिन होता। रंगोली से जो टीवी से चिपकते, महाभारत, चंद्रकांता, शक्तिमान और फिर कोई फीचर फ़िल्म! एक दिन के लिए किताबों को सुला दिया जाता था। स्कूल में जो सीखता, उसे घर आकर दोबारा प्रयास करता था। ट्यूशन पढ़ाने मास्टरजी आया करते थे, एकदम कड़क मास्टरजी। स्कूल में भी वही पढ़ाते थे। उनके छड़ी की आवाज़ बगल के कमरों से आती थी, गज़ब का भय था। मैंने तो हाथ खड़े कर दिए थे कि मैं नहीं पढूंगा। एक घंटे के लिए आते थे वो और 20 मिनट मुझसे निपटने में लग जाता था। हम भी ढीठ थे, एक नंबर के। फिर मम्मी का हस्तक्षेप होता और छोटू चुपचाप पढ़ने बैठ जाता। बिजली जाने पर भैया-दीदी के कॉपी को मैं ही गायब कर दिया करता था। हाँ, बिजली जाने का मतलब होता था सोना। झटपट किताब-कॉपी बंद, होमवर्क की चिंता किये बगैर चल देते सोने ठाट से। स्कूल में आये दिन होने वाले क्विज और अन्य प्रतियोगिताओं में मेरा प्रदर्शन अच्छा होता गया। उस समय इन्टरनेट नया नया आया था मार्केट में। कुछ भी पढ़ते नेट पर तो फट से उसको कॉपी पर लिख लेते और अगले दिन क्लास में अपने तेज़ी को प्रमाणित करते। हमारा भी गैंग हुआ करता था जो बारी बारी से एग्जाम में टॉप करते थे। कभी हम, कभी चित्रांश तो कभी अभिजीत। एग्जाम और रिजल्ट को छोड़ ऐसे हम तीन जिगरी यार थे, साथ खेलते, खाना खाते और साथ बैठते। तब फर्स्ट बेंच पर बैठने के लिए लड़ाई कर लेते थे हमलोग। ऐसे ही एक दिन ऋचा आयी थी क्लास में नए स्टूडेंट के रूप में। उसके बाद हमलोग कभी टॉप नहीं कर पाए, पता नहीं क्या खाती थी, कहाँ से पढ़ती थी, पर थी बहुत तेज़!
देर शाम जब पापा के साथ सब्ज़ी खरीदने जाता तो रास्ते में मंदिर में मत्था टेककर यही दुआ करता कि क्लास में हर बार टॉप करता रहूँ। दुनिया कहाँ देखी थी तब, ज़िन्दगी का कितना अनुभव था मुझको। ये वही शहर है जिसने मुझे साइकिल चलाना सिखाया था। कितने ज़िद के बाद जाकर साइकिल से स्कूल जाने को मिला था, ख़ुशी का ठिकाना न था। साईकिल को ही अपना हुड़ीबाबा मान शहर की गलियों में विचरण करता मैं, अब कोचिंग जाने लगा था। कोचिंग, नेतरहाट प्रवेश परीक्षा के लिए। अब शामें पहले जैसी नहीं रहीं। खेलना तो जैसे भूल ही गया था। स्कूल से सीधे उधर ही चला जाता और रात को घर आता। स्कूल में अंग्रेज़ी में सीखी चीजों को वापस हिंदी में पढ़कर अच्छा भी लगता था और बोरियत भी। जैसे-तैसे नेतरहाट गया तो वहां के रहन-सहन, वहां की परंपराओं की आंधी में मैं सबसे पहले अपने शहर को भूल गया। पापा को लिखे चिठ्ठियों में मैं अक्सर अपने शहर के बारे में पूछ लेता था, उत्तर हमेशा एक ही आता- जैसा था, वैसा ही है। फिर साल में 3 महीने छुट्टी होती तो घर जाता, कॉलोनी के दोस्त सब बाहर चले गए पढाई के लिए और स्कूल के मित्रों से अब पूर्व जैसे सम्बन्ध न रहे थे। मेरा शहर मेरे घर तक सिमट गया था, मैं उसी में खुश रहता था। हाँ एक साथी और था मेरे जीवन में- मेरा कंप्यूटर। वक़्त की मांग को समझते हुए पापा एक दिन खरीद ही लाये थे। नेतरहाट जाने के बाद से ही अंतर्मुखी गुण आ गए थे मुझमे, सहारा सोशल मीडिया से मिला था।
नेतरहाट में एक दोपहर, अचानक घर से फ़ोन आता है। हमने शहर छोड़ दिया था और रांची आ गए थे। कारण अनेक थे पर इस बात को दिल ने स्वीकार करने से मना कर दिया था। अंतिम समय में मैंने अपने शहर को ठीक से देखा तक नहीं था, गुड़ बाय भी नहीं कह पाया था। शहर मुझसे जरूर रूठ गया होगा।
आज 6 साल हो गए, याद तो आती थी पर कभी शहर ने मुझे बुलाया नहीं। रास्ते से जब भी गुजरता, गढ़वा स्टेशन पर उतरकर 5 मिनट चहलकदमी जरूर करता। जी करता था गाडी वहां से आगे बढे ही न! मोहभंग होते देर न लगती थी और मेरे शहर से मेरी दिल्लगी अधूरी रह जाती थी। आज फिर मौका मिला है, सीने में यादों का बंडल है और आँखों के सामने पार होते न जाने कितने स्टेशन। डाल्टनगंज आते ही मुख पर मुस्कान आ जाती है, मैं वापस जा रहा हूँ, मैं पुकारता हूँ अपने शहर को। 12 साल की दोस्ती कब प्यार में बदल गयी, पता ही नहीं चला। पर अब मैं आ गया हूँ, पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!
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