रांची के किस्से…

झारखण्ड बंद है आज, गाड़ियां और ऑटो नहीं चल रहे; रांची में भी नहीं। कॉलेज की छुट्टी हुए अभी 2 दिन हुए हैं, ऋचा को 5 बजे शाम की ट्रेन पकड़नी है पर सुबह से वो परेशान है कि BIT मेसरा से रांची स्टेशन कैसे पहुंचा जाए। 500 रुपये में भी कोई औटोवाला जाने को तैयार नहीं। कोई शीशा फोड़ दिया तो, कोई टायर से हवा निकाल दिया तो, न जाने कितने संदेह थे ऑटोवाले को! रांची में बंद और बारिश कभी भी हो सकते हैं!

ऋचा ने मुझे फ़ोन किया था, सुबह के 6 बजे। मैंने उसे आश्वस्त किया कि किसी भी हाल में पहुँचा दूंगा समय पर। ये वही ऋचा थी, जिससे कॉलेज के पहले दिन ही मैं इश्क़ कर बैठा था पर अफ़सोस जज़्बातों की इन मंद आवाज़ों को लबों पर आज दो साल बाद भी सजा नहीं पाया, कभी मौका नहीं मिला। आज की भाषा में, वो मेरी क्रश थी।

अब इसे भाग्य का खेल कहें या मेरे परिश्रम का पारितोषिक, रांची से बारहवीं पास करने के बाद मुझे एडमिशन भी मिला तो BIT मेसरा में, घर से बस 14 किमी दूर! आज मेरी ख़ुशी का ठिकाना न था। बाइक की चाभी हाथ में घुमाता, मैं निकल पड़ा था कॉलेज की ओर; जैसे राज निकला था अपने सिमरन के लिए! सुनसान पड़े सडकों पर सरपट बाइक दौड़ाते हुए मैं खुद को धूम के जॉन अब्राहम से कम नहीं समझ रहा था। कॉलेज पहुँचकर ऋचा को दुखी पाया तो मेरा दिल भी बैठ गया। दिल्ली में बैठे उसके पिताजी सुबह से न जाने कितनी बार उसे खरी खोटी सुना चुके थे, ऋचा के सुर्ख होंठ सबकुछ बयां कर रहे थे। कैंटीन जाकर कॉफ़ी पीकर ही वो शांत हो पाई थी।

बाइक पर सवार हम रेलवे स्टेशन गए, उसके सामानों को क्लोक रूम में सुरक्षित रखकर हम चल पड़े थे खुली हवा में सांस लेने, शहर को नजदीक से देखने, अपने शहर रांची से साक्षात्कार करने। उसके चेहरे पर उत्साह नहीं थी, उसे यकीन नहीं था कि वो स्टेशन पहुँच पायेगी। पर अब वो मन ही मन खुश थी और मेरा भी दिल हल्का हो चला था। बाइक से रांची को देखने का मज़ा ही कुछ और था, मैं सोच ही रहा था कि कहाँ और कैसे जाना है, ऋचा ने चलने को कहा। बिरसा मुंडा फ़ूड प्लाजा में नास्ता किया और चल पड़े थे हम।

नेतरहाट विद्यालय से दसवीं में राज्य के टॉप 5 में आने के बाद आज पहली बार इतनी ख़ुशी मिली थी। पूरे रांची को कभी पैदल या साइकिल से घुमा करता था मैं, वापस उन्ही गलियों में आकर काफी सुकून की अनुभूति हो रही थी। उस समय कहाँ थे वो KFC, डोसा प्लाजा और चॉकलेट रूम! हमारे लिए तो बस हरिओम टावर था, फिरायालाल था और चर्च काम्प्लेक्स था जहाँ की कावेरी हमेशा से चर्चित थी! बहु बाजार और चुटिया होते हम खादगढ़ा पे धूल चाटते बसों को देख रहे थे, बंद ने इन जटिल यंत्रों की साँसें ही छीन ली थी। कांटाटोली पर जाम को हम मिस कर रहे थे। ट्रैफिक पुलिस भी सुकून से पान-सिगरेट दबा रहे थे। डंगराटोली के पास के ऑडी के शोरूम को देखकर रांची के तरक्की के सपने साकार होते नजर आते थे। ऋचा को शॉपिंग का बड़ा शौक था, सो ईस्टर्न मॉल के पंतलून्स से न जाने कितने सामान खरीद लिए थे उसने।

हमारे पास 7 घंटे थे और मैं चाहता था ऋचा अपने साथ रांची की यादों की शॉपिंग भी करते जाए जिसमें कोई डिस्काउंट न हो।

लालपुर से हरिओम टावर का रुख किया, मैंने उसे अपने 2 साल के संघर्ष के बारे में बताया। रांची में जितने शॉपिंग मॉल नहीं होंगे उससे ज्यादा तो यहाँ कोचिंग संस्थान थे जहाँ अनगिनत बच्चे अपने भविष्य को बनाते-बिगाड़ते हैं। वहीँ वर्धमान कंपाउंड में मैंने अपना घर दिखाते हुए किसी संकरी गली लेकर उसे निर्माणाधीन Nucleus मॉल ले गया। रांची में इतना विशाल और भव्य मॉल देखकर ऋचा जरूर आश्चर्यचकित रह गयी थी पर उसे पता था कि ये वर्षों से दबे-कुचले, हाशिये पर धकेले हुए कस्बाई अस्तित्व का फ़िज़ूल का हूल देते आई, हर बात में रिफार्म-रिफार्म चिल्लाती महानगरीय व्यवस्था को करारा जवाब होगा। फिर मोराबादी के ऐतिहासिक मैदान, फुटबॉल स्टेडियम, हॉकी एस्ट्रोटर्फ, टैगोर हिल होते हुए कांके डैम और रॉक गार्डन की सैर की। यूँ ही कभी ऋचा ने पीछे से मेरी बाहों को जोर से पकड़ लिया था, उसे मुझपे भरोसा था, मेरे दिल की धड़कनें शतक मार रहे थे!

झरनों का शहर कहे जाने वाले रांची की इस प्राकृतिक बहुरूपता ने ऋचा को विस्मय से भर दिया था। राजभवन और मुख्यमंत्री आवास के बाहर हर दिन की भांति आज भी लोग धरने पर बैठे थे, कचहरी भी सुनसान और अप्पर बाजार भी। हाँ फिरायालाल और मेन रोड में चहलकदमी थोड़ी ज्यादा थी। फुटपाथ पर और डेली मार्केट में आपको क्या नहीं मिल जाता है, ऋचा ने अपने फ़ोन के लिए कवर लिया और चल दिए हम सिनेमा देखने- प्लाजा में। सुल्तान के हर घूसे पर सीटियों की होड़ लगती थी तो अनुष्का को छेड़ने पर गालियों की बौछार। मैंने ऋचा का हाथ थाम लिया था, सुल्तान की जीत पर हमने तालियां बजायी और निकल पड़े बाकी के सफर के लिए। मेन रोड से ही तो हमेशा रांची की पहचान रही है, मंदिर मस्जिद चर्च गुरूद्वारे की धार्मिक सहिष्णुता को समेटे, मान्यवर, चर्च काम्प्लेक्स, क्लब काम्प्लेक्स, जे डी हाई स्ट्रीट मॉल, डोमिनोज़, बिग बाजार जैसे आधुनिक प्रतिष्ठानों को एकीकृत करता है।

चार बज गए थे और हमें एहसास ही नहीं था कि हमने आधी रांची देख ली थी। रेलवे स्टेशन के वेटिंग हॉल में ऋचा के पास बैठकर मैंने पाया था कि समय काफी तेज़ी से बढ़ रहा था। मैं ज्यादा से ज्यादा समय उसके साथ बिताना चाहता था, रांची से उसका परिचय कराना चाहता था।

कभी रांची का मतलब बिहार होता था और बिहार का मतलब लालू और लालू का कोई खास मतलब होता नहीं था। आज रांची की अपनी पहचान है, धोनी से, यहाँ की धरोहर से, यहाँ की खनिज संपदा और प्राकृतिक सुंदरता से। हड़िया के जाम से है और गमछा लहराते लड़कों से है!

मुझे ऋचा को यहीं रांची में रोक लेने का मन कर रहा था, शायद उसका भी यही मन हो!
ऋचा ने अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया था, ट्रेन प्लेटफार्म पर आ चुकी थी और वो कुछ घबराई सी लग रही थी। ‘राहुल, मुझे यहाँ तक लाने के लिए शुक्रिया, पार्टी मैं वापस आकर दे दूंगी। आज… सच में मुझे रांची से प्यार हो गया है… तुमसे प्यार हो गया है…!!’

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