अनारकली एक बोल्ड स्टेटमेंट है, सीधे आरा से!

एक हीरो है, वो विलेन भी है, उसके पास ताक़त है, उसे पावर का गलत काम में सही तरह से उपयोग करने भी आता है, हवस है, हवस की अग्नि को घी-तेल देने अफसर-सहयोगी भी हैं, वो निर्लज्ज है, घमंडी है, वो यूनिवर्सिटी का वीसी है।
एक हीरोइन है, वो अनार है, वो देसी तंदूर है, गाती-बजाती है, आरा के दिलों की धड़कन है, उसे लिपस्टिक लगाने का शौक है, उसपे बुरी नज़रें पड़ती रहती हैं पर उसे कोई फर्क नही पड़ता जब तक कोई हद न पार कर दे, वो स्वावलंबी है, गिरकर उठना जानती है, वो जानती है कि वो अकेले उन बुरी ताकतों से नहीं लड़ सकती, उसे इज्ज़त बचाने या पैसे कमाने के लिए इज्ज़त बेचने का कोई शौक नही, वो मानती है कि वो पूरी तरह पवित्र नही है पर ना का मतलब तो ना ही होता है ये हमने पिंक जैसे फ़िल्म में ही सीख लिया था।
एक और हीरो है, वो भी गाते-बजाते हैं, अश्लील गानों और शायरी के पैकेट हैं, सारे डील यही फाइनल करते हैं, इन्होंने गरीबी और शोषण के तले दबकर जीना सीख लिया है और दूसरों को भी सिखा रहे हैं, बिहार के चापलूस और चमचा वर्ग के अग्रिम पंक्ति में विराजमान हैं, नतीजा इनकी बीवी गैर के साथ फरार है, ये करें तो क्या करें!
एक पुलिस वाले हैं, देश की सेवा में लगे हुए हैं, तन-मन-धन से लगे हैं, जनता इनसे डरती है और ये ऊपर के लोगों से डरते हैं, वीसी के भाड़े के टट्टू हैं, मामले को रफा दफा करने खूब आता है इनको, घूस को प्रसाद स्वरूप ग्रहण करते हैं, पुलिस का एक ऐसा चेहरा जो हम हमेशा से देखते आये हैं, एक बार फिर सही।
एक नरीमन जी हैं, अनार के दीवाने हैं, दिल के अच्छे लगते हैं, अनार के दूसरे दीवानों से अलग हैं, अनार को समझते हैं और मदद करते हैं, कहानी के इंजन में ग्रीस का काम करते हैं, दर्शक फ़िल्म को याद रखें या ना रखें, ये जनाब देश के लिए याद रखे जाएंगे, भारतीय समाज के लिए नाईटवॉचमैन बने रहेंगे।

अनारकली ऑफ आरा इन जैसे जटिल किरदारों की खिचड़ी है, स्वादिष्ट है। निर्देशक और लेखक अविनास दास ने इस व्यंजन को बनाने में उत्तम गुणवत्ता के मसाले इस्तेमाल किये हैं, धीमी और मध्यम आंच पर बारीकी से पकाई और सुंदर सजावट के साथ पेश किया है। एक नज़र में कहानी सामान्य लग सकती है पर इसका फिल्मी रूपांतरण अद्भुत है। अपनी पहली फ़िल्म में ही अविनाश ने निर्देशन की बारीकियों का ध्यान रखा है और अनारकली के माध्यम से समाज के उस चरित्र को चिन्हित किया है जिसे हमें स्वीकार करने में हिचकिचाहट होती है। पेट सब भरना चाहते हैं पर कोई थाली से भोजन उठाना नही चाहते।

फ़िल्म इसलिए भी खास है क्योंकि भोजपुरी में अश्लीलता को लेकर जितनी भी बातें की जाती हैं, पर लोगों के बीच वही भाषा अतिलोकप्रिय भी है। भाषा के उपयोग-दुरुपयोग पर प्रश्न उठाने पर लोगों का वही हाल होगा जो बिहार में शराब बंदी से हो रहा है। ऑर्केस्ट्रा वाले अगर साहित्यिक गाने लिखने-गाने लगेंगे तो बॉलीवुड के गीतकार बेरोजगार हो जाएंगे। अनार के किरदार से ये साफ है कि उन स्त्रियों को समाज में वो इज्जत नही मिलती जितने की वो हक़दार हैं, चाहे वो अनार की माँ हो या अनार खुद। इंग्लिशपुर आरा में उनका चरित्र आसमान के रंग की भांति बदलता है, रात में स्वच्छ और दिन में कीचड़। फ़िल्म पुलिस अफसरों पर प्रश्न दागती है, उनकी वफादारी पर सवाल उठाती है। व्यक्ति पूजा और देश सेवा के बीच अंतर साफ झलकता है जहाँ प्रमुख निर्णय ट्रांसफर के डर से लिये जाते हैं।

कहानी सरल है इसका मतलब ये नही कि प्लॉट में ट्विस्ट नहीं है। अनार वीसी को थप्पड़ मार भाग तो जाती है, दिल्ली पहुँच जाती है पर मुश्किलें इतनी जल्दी पीछा थोड़े छोड़ती हैं! दिल्ली के बाद का सफर रोमांचक है, उतना ही रोचक कहानी का अंत। अनार का तांडव उसकी प्रतिभा और उसके प्रतिशोध का प्रतीक है। अनारकली का किरदार तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग को शायद हजम न हो पर ‘कड़ाही आपका है, तेल आपका है, अब आप पूरी छानिये या हलवा बनाइये’।

एक्टिंग के मामले में स्वरा भास्कर का काम लाजवाब है। निल बट्टे सन्नाटा के बाद एक बार फिर स्वरा ने बॉलीवुड में अपनी एक अलग किस्म की छवि को बरकरार रखा है। नारीवाद से हटके नारीत्व की बात करते हुए स्वरा दिलों तक उतरती है। संजय मिश्रा को विलेन बनाना एक सफल प्रयोग माना जायेगा और उन्होंने बखूबी अपने किरदार के औचित्य को सिद्ध किया है। पंकज त्रिपाठी हमेशा की तरह फिट हैं, बड़बोले हैं और अभिनय बिल्कुल नेचुरल है। बाकी सारे किरदार आते-जाते रहते है सबकी अदाकारी एक से बढ़कर एक है। लोग फिल्म को भूल जायेंगे, पर अनारकली जिन्दा रहेगी, उसका हाथ जोड़कर प्रणाम और सर झुकाकर इश्क वाला आदाब लोगों को याद रहेगा!

संगीत ही फ़िल्म का मेरुदंड है। फ़िल्म की शुरुआत से ही भोजपुरी लोक संगीत कानों को आनंद प्रदान करते हैं। गाने के बोल बिल्कुल भी सरल नही है, उनमें दोहरे अर्थ छुपे हुए हैं। गीतकारों ने सच में उम्दा काम किया है। फिल्मांकन में त्रुटियाँ जरूर रही हैं पर अविनाश के जानदार स्क्रिप्ट ने लय को बरकरार रखा है। पहली फ़िल्म होने के नाते आशाओं और उम्मीदों का बोझ जरूर रहा होगा सर पर, लेकिन जिस साहस से अविनाश ने ऐसे जटिल विषय पर फ़िल्म पेश किया है, उनके पीठ थपथपाने की जरूरत है। अविनाश आपका धन्यवाद।

फ़िल्म का इंतज़ार तो काफी दिनों से था, फ़िल्म आई, देखने मे देर जरूर हुई पर आज मैंने देख ही ली अनारकली ऑफ आरा को।

आप मार-धाड़ एक्शन से भरपूर फ़िल्म के प्रेमी हो या प्यार-मोहब्बत रोमांस के दीवाने, एक बार अपना मूड बदल के देखिये अनारकली को, आरा की देसी तंदूर को। यकीन मानिए, मज़ा आएगा। अब मेरे लिए न सही, देश के लिए सही, विथ लव!

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