दिवाली, सफाई और नेतरहाट

दीवाली के आते ही खुशियों की लहर दौड़ पड़ती है। जो घरों से दूर रहते हैं, उनके लिए तो दीवाली वनवास के बाद घर वापसी का प्रतीक है। उनके स्वागत में घी के दिये जलाये जाते हैं और मिठाइयां बांटी जाती हैं। राजशाही ठाट-बाट और ठूस-ठूस कर खिलाये जाते स्वादिष्ट पकवान इस घर वापसी को स्वर्ग वापसी बना देते हैं। उनके लिए दीवाली का मतलब है आराम; एकाध दीपक जल जाए तो फ़ोटो फेसबुक पर होता है, रंगोली कोई भी बनाये पर इनके योगदान की चर्चा सबके जुबान पे होती है, भुकभुकिया बल्ब न जले तो इनको बुलाया जाता है और फुलझड़ी-पटाखे तो इनके बिना फोड़े ही नहीं जाते। घर पे मेहमान आये तो केवल इनके ही चर्चे – कब आया, कहाँ है, कितना दुबला हो गया है, मेरे घर का डिश एंटेना खराब हो गया है ज़रा देख लेना, क्या करते रहते हो मोबाइल पर…! उनका बस चले तो शादी की बात भी वहीं पक्की हो जाये। कुल मिलाकर लॉटरी में उनके हाथ जैकपॉट लग जाता है। पर सब इतने खुशनसीब नहीं होते हैं!

दूसरे होते हैं वो लोग जो या तो घरों पे रहते हैं या जिनके कॉलेज घर से काफी नजदीक होते हैं। उनको घर की मुर्गी दाल बराबर समझा जाता है। उनके लिए दीवाली दीपों का त्योहार नहीं, सफाई का उत्सव होता है। 10 दिन में पूरे भारत को स्वच्छ कर देने की ताकत होती है इनमें। घर आने पर प्रशंसा के रूप में ये नहीं सुनने को मिलता कि बेटा कितना मोटा हो गया, कितना पतला हो गया है; इनको ‘थोड़ा घर का काम भी कर लिया करो’ के रूप में फटकार ही सुनने को मिलती है। इनके घर में कदम रखते ही माँ को याद आता है कि पंखा कितना गंदा हो गया और कमरे में मकड़ी के जाल चारों ओर फैले हुए हैं। घर का कोना-कोना साफ करने के बाद निरीक्षण का एक दौर चलता है और उसी समय दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है। अगर सफाई के नंबर मिलते तो मम्मी मुझे 100 में 45 भी न दे! मम्मी को BIS सर्टिफाइड सफाई चाहिए! दबाव का एहसास तब होता है इन सब के बीच इनको रंगोली बनाने का जिम्मा सौंपा जाता है। टेढ़ी खीरों में सबसे कठिन होता है डिज़ाइन का चयन करना। डिज़ाइन ऐसा हो जो बरामदे में आराम से फिट हो जाये और उपलब्ध रंगों में बन जाये। मिला-जुलाकर दिवाली पर घर जाने का विशेष उत्साह होता नहीं इनको, मजबूरी है तो है!

इनके केटेगरी में मैं भी आता हूँ इसलिए एक बात तो स्पष्ट है कि ये युद्धस्तर पर होने वाली सफाई मुझे बिल्कुल पसंद नहीं!

ऐसे में याद आती है नेतरहाट की दीपावली! वहाँ घर जाने का सवाल ही नहीं पैदा होता था और आश्रम भी किसी घर से कम भी नहीं होता। कम से कम दो सप्ताह पहले से दिवाली की तैयारियां शुरू कर दी जाती थी। सफाई करने की प्रेरणा के लिए किसी स्वच्छ भारत अभियान की जरूरत नहीं पड़ती थी, प्रतिस्पर्धा की भावना ही काफी है – सब अपने आश्रम को टॉप कराना चाहते थे। फिर आता था मॉडल बनाने का टाइम। 21 आश्रम और 21 एक से बढ़कर एक मॉडल जो प्राचीन काल से लेकर आधुनिक परम्पराओं की झलक पेश करता था। कुछ आश्रम पहले से ही हार मान जाते थे, उनको पता था कि उनके अंतेवासी किसी काम के लायक नहीं। लिहाजा वो मंदिर ही बना देते थे, क्या पता भगवान के डर से नंबर मिल जाये। सीमित संसाधनों के उपयोग से ऐसा प्रदर्शन अद्भुत और अकल्पनीय होता था। रात में आश्रम भ्रमण कर मूल्यांकन करते समय में सब अपने आश्रम को टॉप पे रखते थे। नेतरहाट की दीवाली, जो देख ले वो पछताए, जो ना देखे, सो भी पछताए!

दो सप्ताह तक चलने वाले सफाई अभियान अपने आप मे सर्वांगीण विकास का पर्याय है। पीटी के बाद सफाई, विद्यालय के बाद सफाई, खेल के बाद सफाई और अगर छुट्टी रही तो दिनभर सफाई ही सफाई! इन सब के बीच पढ़ाई सामान्यतः चलती रहती है। अल्पना बनाने में उपयोग किये जाने वाले सभी सामग्री पूरी तरह प्राकृतिक होते थे। अल्पना निर्माण में भी लोग जी-जान लगा देते थे। ऐसे में कुछ डंडिमार लोग भी होते थे, जो काम करने से ज्यादा करवाने पर ध्यान देते थे। मेरे समकालीन लोगों में से किसी से भी पूछ लें तो पता चलेगा कि मैं डंडिमारने में हमेशा अव्वल रहा था; दिवाली के मौके पर तो मेरी ये प्रतिभा अपने चर्मोत्कर्ष पर होती थी। मैं सदा से ही दूसरे कैटेगरी में शामिल था जिसमे अधिकांश कनीय छात्र हुआ करते थे। पहले कैटेगरी में थे तो बस वरीय छात्र और डे-स्कोलर छात्र। 2007 में नेतरहाट प्रवेश के बाद लगभग 10 साल से मेरे लिए दिवाली का मतलब कुछ खास नहीं बस सफाई ही रहा है, कभी दिल से किया तो कभी बेमन से।
काश मैं अपने भीतर की गंदगी को साफ कर पाता…
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